आजाद भारत में अब भी 'आजादी' की जरूरत



हमारा देश आजाद है और हम भी। लेकिन अब भी कई तरह की गुलामी ने हमें जकड़ा हुआ है। बहुत-सी ऐसी बुराइयां हैं, जिसने जंजीर की तरह हमारे पैर बांध रखे हैं, जो विकास की राह में रोड़ा हैं और जिनसे हमें आजाद होने की सख्त जरूरत है। आज वर्ल्ड फ्रीडम डे है। हमने अलग-अलग फील्ड के जाने-माने लोगों से पूछा कि आजाद भारत में हमें किस गुलामी से आजादी चाहिए।

विष्णु खरे, साहित्यकार : हमारे पास जो आजादी है, यह आजादी का पहला चरण है। अगर इसे एक बच्चा माना जाए तो इस घुटने के बल चलने वाले बच्चे ने खड़े होकर बस कुछ डग ही भरे हैं। अभी इसे दौड़ना बाकी है। इसके लिए जाति-पाति, सांप्रदायिकता, गैर बराबरी, अंधविश्वास, भ्रष्टाचार और अन्याय से आजादी की जरूरत है। पर्यावरण को दूषित करने की मानसिकता से भी हमें आजाद होना होगा। आधुनिकता की अंधी दौड़ भी हमारे पैरों को जकड़े हुए है। इस जंजीर से भी हमें आजादी चाहिए।

कुलदीप नैयर, वरिष्ठ पत्रकार : हिंदुस्तान हमेशा से उसूलों और परंपराओं के मामले में बहुत धनी रहा है। लेकिन अब हम लोग अपने उसूलों से डिग गए हैं। दौलत की चकाचौंध और सत्ता के नशे में उसूलों से मुंह मोड़ रहे हैं। इसलिए आपाधापी बढ़ गई है। हम जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर, क्षेत्र के नाम पर बंट रहे हैं। वह मान्यताएं और मूल्य खत्म हो रहे हैं जो हमें एक सूत्र में पिरोती थीं। हमें उन सभी वजहों से आजादी चाहिए जो हमें अपने उसूलों से डिगा रही हैं।

राजेंद्र सिंह, मैग्सेसे अवॉर्ड विनर : असली आजादी वह होती है जिसमें इंसान सादगी से सांस्कृतिक विविधताओं का सम्मान करते हुए जी सकता है। अभी हमें जमीर की आजादी नहीं मिली है। लड़का-लड़की के बीच अभी भी भेदभाव हो रहा है। हमें बराबरी की आजादी और सांस्कृतिक-सामाजिक आजादी की जरूरत है। बाजारू साइंस और टेक्नॉलजी ने प्राकृतिक स्रोतों का अति शोषण किया है, जिससे आजादी दिलाने की जरूरत है।

जावेद अख्तर, गीतकार : गरीबी हमारे देश के विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा है। हमें गरीबी और अशिक्षा से आजादी चाहिए। करप्शन की जड़ें लगातार फैलती जा रही हैं। इस जकड़न से हमें मुक्ति चाहिए। जाति, क्षेत्र, भाषा के नाम पर जो भेदभाव है, उससे आजाद हुए बिना हम कभी आगे नहीं बढ़ सकते, सच्चे अर्थ में आजाद नहीं हो सकते हैं।

बी.बी. भट्टाचार्य, वीसी, जेएनयू : जब तक गरीबी से आजादी नहीं मिलती तब तक इस आजादी का फायदा नहीं उठाया जा सकता। सार्वजनिक जीवन में गैरजिम्मेदार रवैये से आजाद होने की जरूरत है। हम लोकतंत्र में जी रहे हैं लेकिन राष्ट्रीय भावनाओं की बजाय जातिगत, क्षेत्रगत भावनाएं हम पर हावी हो रही हैं। इन भावनाओं से मुक्ति चाहिए। उत्तर भारतीयों को मुंबई में काम करने से रोका जा रहा है, जम्मू-कश्मीर और नॉर्थ ईस्ट में हम काम तो कर सकते हैं लेकिन बस नहीं सकते, हमें ऐसी प्रतिबंधित आजादी की बजाय पूरी आजादी चाहिए।

वृंदा कारत, नेता, सीपीएम : जब तक समाज को भूख से आजादी नहीं मिलती तब तक शोषण का आधार तैयार होता रहेगा। हमें इससे आजादी चाहिए। परंपराओं के नाम पर हो रहे शोषण से आजादी चाहिए। जाति प्रथा, लिंग भेदभाव की जंजीरें तोड़ने की जरूरत है। हमारे समाज को अपराधों से आजादी चाहिए।

मिलिंद देवड़ा, सांसद : हमें इकॉनमिक फ्रीडम की जरूरत है। 1991 के बाद सुधार शुरू हुए, लेकिन देश का हर शख्स इकॉनमिक ग्रोथ का हिस्सा नहीं है। संविधान द्वारा फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन ऐंड स्पीच तो मिली हुई है। पर यह हर जगह नहीं होती। अगर मैं कुछ कहता हूं तो दूसरे दिन विरोधी मेरे घर के बाहर हंगामा करते हैं तो यह एक्सप्रेशन की आजादी नहीं है। हमें सही मायने में यह आजादी चाहिए।


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